चाहता हूँ कि ग़म में भी रोओ न तुम ।।

पर ख़ुशी में भी बेफ़िक्र होओ न तुम ।।1।।

कुछ तो काँटे भी रखते हैं माक़ूलियत ,

फूल ही फूल खेतों में बोओ न तुम ।।2।।

रोज़ लुटता है आँखों से काजल यहाँ ,

इस जगह बेख़बर होके सोओ न तुम ।।3।।

जिससे तुम हो उसी से हैं सब ग़मज़दा ,

फिर अकेले-अकेले ही रोओ न तुम ।।4।।

याद से जिसने तुमको भुला रख दिया ,

भूल से उसकी यादों में खोओ न तुम ।।5।।

माना दुश्मन का है , है मगर हार ये ,

इसमें फूलों से काँटे पिरोओ न तुम ।।6।।

दब ही जाओ , कुचल जाओ , मर जाओ सच ,

बोझ ढोओ ; पर इतना भी ढोओ न तुम ।।7।।

लोग चलनी ही हमको समझने लगें ,

इतने भी हममें नश्तर चुभोओ न तुम ।।8।।

-डॉहीरालाल प्रजापति 

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