बहुत सी पास में खुशियाँ हों या इफ़्रात में हों ग़म ।।

कि रेगिस्तान हो दिल में या क़ामिल आब-ए-ज़मज़म ।।

है ज़ाती तज़्रुबा मेरा ये ज़ाती सोच मेरी ,

कि शायर की क़लम में तब ही आ पाता है दम-ख़म ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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