इक भी बेदिल से नहीं सब ही रज़ा कर लिखिये ॥

लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समझ-सोच-बजा कर लिखिये ॥

डायरी ख़ुद की कभी आम भी हो सकती है ,

दिल के जज़्बात शायरी में सजा कर लिखिये ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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