हैं इस क़दर ग़लीज़ कि गंगा न धो सके ।।

बोझिल हैं यों ज़मीन भी उनको न ढो सके ।।

वो ख़ुद भी आरज़ू-ए-क़ज़ा रखते है मगर ,

सब में तो ख़ुदकुशी की न हिम्मत है हो सके ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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