अंदर थार मरुस्थल बाहर हिन्द महासागर सा तृप्त ।।

सूट-बूट में लगता ज्ञानी-चतुर-चपल पर है विक्षिप्त ।।

कितने अवसर पुण्य कमाने के मिलते हैं किन्तु तुरन्त-

लाभ हेतु रहता मानव प्रायः लघु-महा पाप संलिप्त ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *