मेरी धड़कन की तो रफ़्तार बिगड़ जाती है ।।

जब हथेली वो मेरी चूम पकड़ जाती है ।।1।।

जब शुरूआत बिगड़ जाए तो अक़्सर देखा ,

बात छोटी से भी छोटी हो बिगड़ जाती है ।।2।।

खुरदुरेपन से निकल जाएँ जभी सोचें बस ,

अपनी चिकनाई तभी और रगड़ जाती है ।।3।।

जिसकी सुह्बत को तरसते हैं अपनी क़िस्मत से ,

हमसे अक़्सर वो न मिलने को बिछड़ जाती है ।।4।।

मेरी चादर है कि रूमाल है कोई यारों ,

सिर को ढँकने जो लगूँ रान उघड़ जाती है ।।5।।

उसको मैं सुल्ह को जितना ही मनाना चाहूँ ,

नाज़नीं उतना वो और-और झगड़ जाती है ।।6।।

ज़िंदगी जैसे लिबास इक हो किसी मुफ़्लिस का ,

कितने पैबंद लगाऊँ ये उधड़ जाती है ।।7।।

मैं जो मंज़िल की तरफ़ अपने बढ़ाऊँ दो डग ,

मुझसे ये चार क़दम दूर को बढ़ जाती है ।।8।।

काली करतूतों के खुलने के नहीं डर से ये ,

आदतन ही मेरी पेशानी सुकड़ जाती है ।।9।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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