इक बूँद भर से कलकल आबे चनाब होकर ॥

भर दोपहर का ज़र्रे से आफ़्ताब होकर ॥

अपने लिए तो जैसा हूँ ठीक हूँ किसी को ,

दिखलाना चाहता हूँ मैं कामयाब होकर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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