रह गया है परिंदा तो अब नाम भर ।।

पर तो सय्याद ने सब दिये हैं कतर ।।1।।

खाद-पानी से महरूम बंजर ज़मीं ,

तुख़्म कैसे हो कोई वहाँ फिर शजर ?2।।

बस दरिंदों , फ़रिश्तों का रहवास है ,

शह्र में आदमी के न बसते बशर ।।3।।

कहते थकते न थे इश्क़ को कल ख़ुदा ,

क़ह्र बोलें इसी मुँह से अब हम मगर ।।4।।

प्यार दे मत ब-क़द्रे- ज़रूरत सही ,

क़ाबिले दाद हूँ थोड़ी इज्ज़त तो कर ।।5।।

इश्तेहार अपने फ़न का भी होता अगर ,

हम भी होते तुम्हारी तरह नामवर ।।6।।

दर से मेरे ग़रीबी उठी तो मगर ,

दीनो-ईमान रखकर किसी ताक पर ।।7।।

जब थे बीमार कोई न आया कभी ,

हैं जनाज़े में शामिल कई डॉक्टर ।।8।।

( तुख़्म = बीज )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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