पाँव की तह की ज़मीं और न सर की छत या छाँव ।।

मुल्क़ लगते हैं नहीं लगते सूबे , शहर या गाँव ।।

इसका चस्का है ख़तरनाक कोई खेले तो , तो 

छोटे-मोटे नहीं चलते हैं सियासत में दाँव ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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