वक़्त आएगा न सोचा था ऐसा ख़राब भी ।।

खाएँगे पण्डे गोश्त पिएँगे शराब भी ।।1।।

करते थे वो जो दूध-दही से ग़ुसुल कभी ,

आज उनको घूँट भर भी मयस्सर न आब भी ।।2।।

मिलते हैं उनको आज नहीं फूल कागज़ी ,

रौंदे थे कल जिन्होंने जुही भी , गुलाब भी ।।3।।

ब्योरे करे हैं कुछ तो तलब बूँद-बूँद के ,

कुछ लोग बाग लें न नदी के हिसाब भी ।।4।।

क़ुदरत का भी निजाम अब आदम सा हो गया ,

दर्या में ही बरसते हैं काले सहाब भी ।।5।।

है ज़िन्दगी का इल्म कहीं हमसे बेहतर ,

आता भले यों उनको न पढ़ना किताब भी ।।6।।

भर-भर गिलास पीना दवा का भी ज़हर हो ,

इक चमची पीजिये तो दवा है शराब भी ।।7।।

आया ख़याल हज का तभी से ये बिल्लियाँ ,

कहती हैं अब तकें न वो छिछड़ों के ख़्वाब भी ।।8।।

बदमाश ही न , ज़ुर्म तो कर दें कई दफ़ा ,

हालात की गिरफ़्त में आली जनाब भी ।।9।।

गर्मी में दोपहर को जो दुश्मन बुरा लगे ,

सर्दी में वो ही लगता भला आफ़्ताब भी ।।10।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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