रोते-रोते हो गईं जब मुद्दतें ।।

तब लगीं थीं हमको हँसने की लतें ।।1।।

उनकी खोटी ही रही नीयत सदा ,

पर खरी उनको मिलीं सब बरक़तें ।।2।।

चोर-गुण्डों से ही थीं पहले मगर ,

हो रहीं अब कुछ पुलिस से दहशतें ।।3।।

देखकर मंज़िल पे लँगड़ों की पहुँच ,

पैर वाले कर रहे हैं हैरतें ।।4।।

कुछ को मिल जाता है सब कुछ मुफ़्त में ,

कुछ को कुछ मिलता न दे-दे क़ीमतें ।।5।।

एक जैसी मेहनतों के बावज़ूद ,

कुछ को मिलते नर्क कुछ को जन्नतें ।।6।।

वो जो ईनामों का ख़्वाहिशमंद है ,

हैं सज़ाओं वाली उसकी हरक़तें ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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