पहले सी हममें तुममें मोहब्बत न अब रही ।।

इक दूसरे की दिल में वो इज्ज़त न अब रही ।।1।।

दीनार में औ’ गिन्नी में तुलते थे पहले हम ,

धेले की कौड़ी भर की भी क़ीमत न अब रही ।।2।।

इक दूजे के बग़ैर न रहते थे हम कभी ,

इक दूसरे की कुछ भी ज़रूरत न अब रही ।।3।।

मुद्दत से सो रहे हैं छुरी , पत्थरों पे हम ,

मखमल के बिस्तरों की वो आदत न अब रही ।।4।।

हमने मुसीबतों का किया इतना सामना ,

आफ़त भी कोई हमको सच आफ़त न अब रही ।।5।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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