मुक्तक : 530 – यूँ तो कभी हम आँख

यूँ तो कभी हम आँख को अपनी भूले न नम करते हैं ।। और ज़रा सी , छोटी सी बातों पर भी न ग़म करते हैं ।। हम न तड़पते ग़ैर जिगर में तीर चुभोते तब भी , होती बड़ी तक्लीफ़...Read more

145 : ग़ज़ल – बताशे ख़ुद को

बताशे ख़ुद को या मिट्टी के ढेले मान लेते हैं ।। ज़रा सी बारिशों में लोग छाते तान लेते हैं ।।1।। कई होते हैं जो अक़्सर ज़माने को दिखाने को , नहीं बनना है जो बनने की वो ही ठान लेते...Read more

मुक्तक : 529 – जब अपना ख़्वाब टूटा

जब अपना ख़्वाब टूटा बड़ा दिल का ग़म बढ़ा ।। तब मरते कहकहों का यकायक ही दम बढ़ा ।। जीने को और-और भी मरने लगे अपन , जब ज़ुल्म ज़िन्दगी पे हुआ जब सितम बढ़ा ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 528 – कोयल-कुहुक से काक

कोयल-कुहुक से काक-काँव-काँव से पूछो ।। इन झूठे शह्रों से न गाँव-गाँव से पूछो ।। मेरी सचाई की जो चाहिए गवाहियाँ , हर-धूप-चाँदनी से छाँव-छाँव से पूछो ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

132 : ग़ज़ल – तंग बैठा था मैं

तंग बैठा था मैं ख़ल्वत के क़ैदख़ाने से ।। आ गई तू कि ये जाँ बच गई रे जाने से ।।1।। यूँ तो पहले भी थींं गुलशन में ये बहारें पर , ख़ार भी फूल हुए तेरे खिलखिलाने से ।।2।।...Read more

मुक्तक : 527 – घिनौने फूल को सुन्दर

घिनौने फूल को सुन्दर गुलाब कौन करे ? कि ठहरे नाले को बहती चनाब कौन करे ? लिखे हैं मैनें जो बिखरे भले-बुरे से सफ़े , उन्हें समेट के अच्छी किताब कौन करे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more