उसके इश्क़ में बेशक़ मैनें ज़ीस्त को खोया था ।।

लेकिन यार बिहिश्त भी तो जीते जी ही तो पोया था ।।1।।

क्यों मानूँ न मैं उसका एहसाँ , शुक्र करूँ गिन-गिन ?

जिसने ख़ुद को मिटाकर पूरा मुझको बनोया था ।।2।।

कुछ तो होगा सबब सब सज्दा करते जहाँ जा-जा ,

इक मैनें ही अकेले क्यों वाँ सर न झुकोया था ?3।।

आँखों ने न मेरी इक क़तरा अश्क़ भी टपकाया ,

दर्या भरके मगर दिल उसके हिज्र में रोया था ।।4।।

अब कंकड़ भी उठाना क्यों लगता है मुझे भारी ?

जब बचपन से ही सिर पर बस फ़ौलाद को ढोया था ।।5।।

अब आराम तो काँटों पर ही रूह को मिलता है ,

मेरा जिस्म कभी फूलों पर हाय ! न सोया था ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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