यूँ दर्द से छटपटा रहा हूँ ।।

मैं ज़िंदगानी घटा रहा हूँ ।।1।।

चखा ही मैनें कभी न खाया ,

मगर कहें सब चटा रहा हूँ ।।2।।

मैं सेब होकर भी उस नज़र में ,

हमेशा कददू-भटा रहा हूँ ।।3।।

सभी हुए बाल-बच्चों वाले ,

मैं अब भी लड़की पटा रहा हूँ ।।4।।

उजाले वो भोर के सुनहरे ,

मैं साँझ का झुटपुटा रहा हूँ ।।5।।

वो बनके वेणी सदा रहे हैं ,

मैं साधुओं की जटा रहा हूँ ।।6।।

सटा सका जब न उनको सीने ,

मैं दिल को उनसे हटा रहा हूँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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