सबको नटखट , शरीर और चुलबुली वो लगे ।।

मुझको संजीदा , सीधी-सादी औ’ भली वो लगे ।।1।।

सबको लगती सुपारी सी तो नारियल सी कभी ,

मुझको गुलशन के गुलमुहर की इक कली वो लगे ।।2।।

उसका हर अंग जैसे नाप-तौल कर हो बना ,

अज सरापा ही एक साँचे में ढली वो लगे ।।3।।

वैसे औलाद तो है इक ग़रीब की ही मगर ,

हर अदा से मुझे अमीर-घर पली वो लगे ।।4।।

उसकी कंगन खनक सी , घुँघरू की छनक सी हँसी ,

बामज़ावाज़ से तो नर्म मखमली वो लगे ।।5।।

दोस्तों को तो अम्न ही का है पयाम सदा ,

दुश्मनों को हमेशा ख़बरे-ख़लबली वो लगे ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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