तंग बैठा था मैं ख़ल्वत के क़ैदख़ाने से ।।

आ गई तू कि ये जाँ बच गई रे जाने से ।।1।।

यूँ तो पहले भी थींं गुलशन में ये बहारें पर ,

ख़ार भी फूल हुए तेरे खिलखिलाने से ।।2।।

भूल जाने के जतन छोड़ना पड़े आख़िर ,

याद आती है बहुत और तू भुलाने से ।।3।।

मैं तड़पता था बिछड़ तुझसे ख़ूब रोता था ,

अब ख़ुशी से ही मरा जाऊँँ तेरे आने से ।।4।।

एक सूरज की ज़रूरत है दोस्तों मुझको ,

फ़ायदा , चाँद के ढेरों का , क्या लगाने से ?5।।

-डॉ.हीरालाल प्रजापति

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