बताशे ख़ुद को या मिट्टी के ढेले मान लेते हैं ।।

ज़रा सी बारिशों में लोग छाते तान लेते हैं ।।1।।

कई होते हैं जो अक़्सर ज़माने को दिखाने को ,

नहीं बनना है जो बनने की वो ही ठान लेते हैं ।।2।।

मुसाफ़िर कितने ही कितनी दफ़ा आराम लें रह में ,

कुछ इक ही मंज़िलों पर भी न इत्मीनान लेते हैं ।।3।।

कई देखे हैं जो लेते नहीं *इमदाद छोटी भी ,

वही ख़ुद्दार मौक़े पर बड़े एहसान लेते हैं ।।4।।

*दियानतदार-ओ-दींदार सच्चे , दुश्मनों का भी

कभी नाँ भूलकर भी दीन-ओ-ईमान लेते हैं ।।5।।

(*इमदाद=सहयोग *दियानतदार=सत्यनिष्ठ *दींदार=धर्मनिष्ठ )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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