137 : ग़ज़ल – अंधे ने जैसे साँप को

अंधे ने जैसे साँप को रस्सी समझ लिया ।। चश्मिश ने एक बुढ़िया को लड़की समझ लिया ।।1।। धागा पिरो दिया था सुई में क्या इक दफ़्आ , लोगों ने मुझको ज़ात का दर्ज़ी समझ लिया ।।2।। जानूँ न किस अदा...Read more

मुक्तक : 561 – बज़्म में मस्जिद में या

बज़्म में मस्जिद में या फिर मैक़दा आया ॥ दोस्तों को साथ ले या अलहदा आया ॥ जाने क्यों लेकिन हमेशा वो ख़ुशी में भी , साफ़ नमदीदा बड़ा ही ग़मज़दा आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 560 – लाखों मातम में भी

लाखों मातम में भी जिगर जो न बिलख रोएँ ॥ जिस्म तोला हजारों रत्ती सर टनों ढोएँ ॥ देख हैराँ न हो यहाँ बगल में फूलों के , सैकड़ों नोक पे काँटों की मुस्कुरा सोएँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 559 – यों बुलायी अपने हाथों

यों बुलायी अपने हाथों सबकी शामत ॥ बिल्लियों की देख चूहों से मोहब्बत ॥ अहमक़ों ने शेर के हाथों में अपने, भेड़ ,बकरों ,हिरनों की दे दी हिफाज़त ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

136 : ग़ज़ल – लापता गुमनाम हूँ

लापता-गुमनाम हूँ ।। इस क़दर मैं आम हूँ ।। प्यास से लबरेज़ मैं , और उनका जाम हूँ ।। चाय से परहेज़ , यूँ दार्जिलिंग-आसाम हूँ ।। गर्मियों में खौलती , भेड़ों का हज्जाम हूँ ।। जिस्म में मछली के इक , चकवा...Read more

मुक्तक : 558 – बिना पर बाज से बेहतर

बिना पर बाज से बेहतर परिंदा मानने वालों ॥ मरे होकर हमेशा तक को ज़िंदा मानने वालों ॥ नहीं क्यों शर्म करते आख़री होकर करोड़ों में , हमेशा ख़ुद को दुनिया में चुनिंदा मानने वालों ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more