यह यक़ीं मुझको भी आख़िरकार करना ही पड़ा ॥

इस ज़माने में नहीं है मालोज़र से कुछ बड़ा ॥

क़ीमतों की बात है सब कुछ बिकाऊ है यहाँ ,

जिस्म भी और प्यार भी ,क्या दीन औ’ ईमान क्या ?

फ़र्ज़ रखकर ताक पर सब हक़ की बातें कर रहे ,

जिसको देखो उसको चस्का मुफ़्तखोरी का लगा ॥

कामयाबी और बरबादी का अपना राज़ है ,

है कहीं कोशिश कहीं क़िस्मत का भी कुछ मामला ॥

अपनी वहशत,ज़ालिमाना हरकतों से सच कहूँ ,

आदमी के सामने शैतान भी फ़ीका पड़ा ॥

इस तरह भी कुछ न कुछ बिजली बचत हो जायेगी ,

धूप में जलते हुए बल्बों को हम गर दें बुझा ॥

बेचते हैं  जो शराब औ’शौक़ से पीते भी हैं  ,

रखते हैं वो भी ख़िताब इस शहर में नासेह का ॥

इल्तिजा से बन्दगी से जब न कुछ हासिल हुआ ,

पहले सब कुछ था ख़ुदा अब कुछ नहीं उसका ख़ुदा ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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