यूँ ही सा देखने में है वो छोटा सा बड़ा इंसाँ ॥

सभी को बैठने कहता है ख़ुद रहकर खड़ा इंसाँ ॥

जहाँ सब लोग उखड़ जाते हैं पत्ते-डाल से , जड़ से ,

वो टस से मस नहीं होता पहाड़ों सा अड़ा इंसाँ ॥

वो अंदर से है मक्खन से मुलायम आज़मा लेना ,

यों दिखता है वो ऊपर नारियल जैसा कड़ा इंसाँ ॥

नहीं मिलता कहीं दो घूँट जब पानी मरुस्थल में ,

वहाँ ले आ पहुँचता है वो पानी का घड़ा इंसाँ ॥

जो सोता बेचकर घोड़े वो उठ जाता है बाँगों से ,

नहीं उठता है आँखें खोलकर लेटा , पड़ा इंसाँ ॥

यों जुड़ता है किसी से जैसे उसका ही वो टुकड़ा हो ,

क़रीने से अँगूठी में नगीने सा जड़ा इंसाँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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