क़ुदरत ने तो था बख़्शा हमको हुस्न लाजवाब ॥

जंगल घने थे , झीलें थीं भरी , नदी पुरआब ॥  

पेड़ों को किसने काट-काट उजाड़ दी ज़मीन ?

हमने  नहीं तो किसने सूरत इसकी की ख़राब ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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