उजड़े इक गाँव से वो मुख्य नगर बन बैठा ॥

ढीला अंडा था परिंदा-ए-ज़बर बन बैठा ॥

बिलकुल उम्मीद नहीं जिसके पनपने की थी ,

देखते-देखते पौधा वो शजर बन बैठा ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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