अंधे ने जैसे साँप को रस्सी समझ लिया ।।

चश्मिश ने एक बुढ़िया को लड़की समझ लिया ।।1।।

धागा पिरो दिया था सुई में क्या इक दफ़्आ ,

लोगों ने मुझको ज़ात का दर्ज़ी समझ लिया ।।2।।

जानूँ न किस अदा से था मैं बोझ ढो रहा ,

पेशे से सबने मुझको क़ुली ही समझ लिया ।।3।।

झाड़ू लगाते देख के अपने ही घर मुझे ,

पूरे नगर-निगम ने ही भंगी समझ लिया ।।4।।

नाले में धो रहा था मैं इक बार चादरें ,

यारों ने अस्पताल का धोबी समझ लिया ।।5।।

पीने से दारू रोक दिया था कभी उसे ,

उसने तो मुझको जन्म का बैरी समझ लिया ।।6।।

वीराने में जवान बहन-भाई देखकर ,

बहुतों ने उनको प्रेमिका-प्रेमी समझ लिया ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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