कोयलें अपनी मधुर आवाज़ को लेकर !

चुप हैं सब साज़िंदे अपने साज़ को लेकर !

क्या हुआ मग़रूर से मग़रूर सब गुमसुम –

क्यों न आज इतराते फ़ख्र-ओ-नाज़ को लेकर ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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