नाम पर ग़ज़लों के पैरोडी , हजल मत दो ॥

चाहिए मुझको असल कोरी नक़ल मत दो ॥

छोड़ देंगे देखना अधबीच में जाकर ,

माहिरों के काम में बेजा दख़ल मत दो ॥

बिन जगाए गर किसी सोते को काम अपना ,

हो सके तो नींद में उसकी ख़लल मत दो ॥

खा गया ग़ुर्बत में जो काजू समझ पोची-

मूँगफलियाँ , अब रईस हूँ आजकल मत दो ॥

फिर न कहना चाय-पानी तक नहीं पूछा ,

यों मेरी देहलीज़ को बस छू के चल मत दो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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