सोने से ज़्यादा उनकी नज़र में खरा रहूँ ॥

पीला कभी पड़ूँ न हरा ही हरा रहूँ ॥

मैं क्या करूँ कि जेह्न-ओ-दिल में दुश्मनों के भी ,

कलसे में गंगा-जल सा लबालब भरा रहूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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