गर्मी में अब्र की कब , ख़ैरात माँगता हूँ ?

मौसम में बारिशों के , बरसात माँगता हूँ ॥

तंग आ चुका घिसटते , उड़ने को पंख कब मैं ,

चलने के वास्ते बस , दो लात माँगता हूँ ॥

हैं पास तेरे नौ-दस , एकाध मुझको दे दे ,

कब तुझसे रोटियाँ मैं , छः सात माँगता हूँ ?

हक़ की करूँ गुजारिश , हक़ के लिए लड़ूँ मैं ,

कब भीख की तलब ? कब , सौग़ात माँगता हूँ ?

उम्मीदे-ख़ैरमक़्दम , ग़ैरों से कब मैं रक्खूँ ?

अपनों में बस ज़रा सी , औक़ात माँगता हूँ ॥

(अब्र =बादल  ; ख़ैरमक़्दम =स्वागत-सत्कार )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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