तुझको पाने को न कल जी-जान से अड़ता ।।

ज़िंदगी का आज पड़ता ही नहीं पड़ता ।।1।।

या तो पक जाता है या फिर रोग से वर्ना ,

शाख़ से पत्ता हरा यूँ ही नहीं झड़ता ।।2।।

कुछ न कुछ टकराव के हालात होते हैं ,

हर किसी से कोई यों ही तो नहीं लड़ता ।।3।।

भीम के भी हाथ से दीवार में कीला ,

बिन हथौड़े के गड़ाये से नहीं गड़ता ।।4।।

टाट में पैबंद मख़मल का लगाओ मत ,

कोई भी लोहे में हीरे को नहीं जड़ता ।।5।।

कितना भी लोहा खरा हो सदियों तक लेकिन ,

रात-दिन पानी में रहकर सड़ता ही सड़ता ।।6।।

एक सुर पर्वत को नाटा कहते रहने से ,

बौने टीलों का कभी भी क़द नहीं बढ़ता ।।7।।

रात-दिन चूसा न होता तुमने जो मुझको ,

तुख़्म दिल में क्यों बग़ावत का मेरे पड़ता ?8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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