वैसे मैं इक मेला हूँ ।।

लेकिन आज अकेला हूँ ।।1।।

ऊपर से जितना हड्डी ,

अंदर उतना केला हूँ ।।2।।

वो चट्टान है सोने की ,

मैं मिट्टी का ढेला हूँ ।।3।।

मुझसे झूठ न बुलवाओ ,

गाँधीजी का चेला हूँ ।।4।।

दोपहरी की आँच नहीं ,

अब मैं साँझ की बेला हूँ ।।5।।

इतना जीत को मत झगड़ो ,

युद्ध नहीं मैं खेला हूँ ।।6।।

मुझको कौन सहेज रखे ?

गिन्नी नाँ हूँ धेला हूँ ।।7।।

तुम कागज़ की नाव बड़ी ,

मैं पानी का रेला हूँ ।।8।।

आप जहाज जो उड़ता है ,

मैं ठहरा हथठेला हूँ ।।9।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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