उसका जीवन सुधर गया होता ॥

मरने से कुछ ठहर गया होता ॥

तैरना जानता तो बिन कश्ती –

और पर बिन भी तर गया होता ॥

मुझसे वो बोलते तो मुश्किल क्या ,

ग़ैर मुमकिन भी कर गया होता ॥

ज़िंदगी से न तंग होता तो ,

मौत से मैं भी डर गया होता ॥

मैं भी परदेश से दिवाली पर ,

काश ! होता तो घर गया होता ॥

पोल उसकी न खुल गई होती ,

क्यों वो दिल से उतर गया होता ?

तह में सूराख़ उस घड़े की था ,

वर्ना बारिश में भर गया होता ॥

ब्रह्मचारी था वर्ना वो तुझपे ,

तुझको तकते ही मर गया होता ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *