मुक्तक : 594 – इक सिवा उसके कहीं

इक सिवा उसके कहीं दिल आ नहीं सकता ॥ है ये पागलपन मगर अब जा नहीं सकता ॥ क्या करूँ मज्बूर हूँ अपनी तमन्ना से ? फिर भी तो चाहूँ उसे जो पा नहीं सकता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

150 : ग़ज़ल – दोस्त कब सौ हज़ार………

दोस्त कब सौ हज़ार करना है ? इक दो बस ग़म गुसार करना है ॥ जिनसे नज़रें मिलाना हो मुश्किल , उनसे आँखों को चार करना है ॥ इस ज़माने में बस मोहब्बत के , और सब कुछ उधार करना है ॥ सब...Read more