मुक्तक : 605 – कुछ जी भर कुछ

कुछ जी भर कुछ नाम मात्र को भोग लगाते हैं ॥ मूरख क्या ज्ञानी से ज्ञानी लोग लगाते हैं ॥ खुल्लमखुल्ला, लुक-छिपकर, चाहे या अनचाहे, किन्तु सभी यौवन में प्रेम का रोग लगाते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 604 – निपट गंजों के लिए

चाँद से गंजों को काले विग घने ॥ दंतहीनों वास्ते डेंचर बने ॥ उड़ नहीं सकते मगर हों पीठ पर , पर शुतुरमुर्गों के शायद देखने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 603 – बेझिझक बाहों में ले

बेझिझक बाहों में ले मुझको जकड़ना क्या हुआ ? सारी दुनिया से मेरी ख़ातिर झगड़ना क्या हुआ ? मेरी छोटी सी ख़ुशी के वास्ते लंबी दुआ , पीर की चौखट पे वो माथा रगड़ना क्या हुआ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 602 – दिल के बाशिंदों से

दिल के बाशिंदों से मुँह मोड़ आये ॥ जाने किस-किस के दिल को तोड़ आये ? जुड़ के रहने का जिनसे वादा था , उनसे हर एक रिश्ता तोड़ आये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 601 – रातें हों, दिन हों

रातें हों, दिन हों, शामें हों या दोपहर, सवेरे ॥ डाले रखते हैं मेरे घर मेहमाँ अक्सर डेरे ॥ रहने के अंदाज़ भी उनके बिलकुल ऐसे हैं सच , यूँ लगता है मैं हूँ मेहमाँ वो घर-मालिक मेरे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 600 – छः को छः

छह को छह , सत्ते को बोले सात वह ॥ दिन को दिन , रातों को बोले रात वह ॥ कैसे मानूँ है नशे में चूर फिर , कर रहा जब होश की हर बात वह ? –डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more