ज़िंदगानी तबाह कर बैठे ।।

ख़ुदकुशी का गुनाह कर बैठे ।।1।।

हमको करना था आह-आह जहाँ ,

हम वहाँ वाह-वाह कर बैठे ।।2।।

जिसको दिल में बसा के रखना था ,

उससे टेढ़ी निगाह कर बैठे ।।3।।

अपना उजला सफ़ेद मुस्तक़्बिल ,

अपने हाथों ही स्याह कर बैठे ।।4।।

ऊबकर तीरगी से कुछ जुगनूँ ,

चाँद-सूरज की चाह कर बैठे ।।5।।

अक़्ल मारी गई थी दुश्मन से ,

दोस्ती की सलाह कर बैठे ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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