मुक्तक : 627 – हो जाए न सुन

हो जाए न सुन चेहरा ज़र्द सुर्ख़-सब्ज़ भी ॥ थम जाए चलते-चलते यकायक न नब्ज़ भी ॥ मेरे तो सामने न इसका नाम लीजिए , मुझको है खौफ़नाक क़यामत का लफ़्ज़ भी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

अकविता : [ 3 ] हत्या

उन से , आप से , स्वयं से , सब से , एक ही किन्तु कदाचित यक्ष प्रश्न : क्यों अपने अवश्यंभावी नश्वर शरीर की अंतिम साँस तक रक्षा करते रहने के लिए हम करते ही रहते हैं अजर , अमर , अविनाशी अपनी ही आत्मा की बारंबार...Read more

अकविता : [ 2 ] जंगली

आज मैं जो भी हूँ मेरे वह होने की वजह तुम्हारे बारंबार पूछने पर भी तुम्हें किस मुँह से कहूँ कि सिर्फ तुम ही हो मैंने कभी भी न चाहा था ऐसा बनना मैं तो चाहता था तुम्हारे मुताबिक बनना...Read more

अकविता : [ 1 ] यूज़

यह सोचकर कि वह सुखी रहेंगे  प्रयत्न करते हैं बहुत बड़ा बल्कि सबसे बड़ा आदमी बनाने का हम अपने बच्चों को किन्तु फिर यह पक्का पता चल जाने पर भी कि उन्हे सचमुच ही बड़ा नहीं बनना है अथवा वे...Read more

मुक्तक : 626 – मेरे लिए वो ख़ुद को

 मेरे लिए वो ख़ुद को तलबगार क्यों करे ? नावों के होते तैर नदी पार क्यों करे ? बिखरे हों इंतिख़ाब को जब फूल सामने , कोई भी हो पसंद भला ख़ार क्यों करे ? [तलबगार = इच्छुक, इंतिख़ाब = चयन, ख़ार = काँटा...Read more

मुक्तक : 625 – मुझको बेशक़ न

मुझको बेशक़ न नज़र आता था मेरा साहिल ॥ चाँद , तारों सी बड़ी दूर थी मेरी मंज़िल ॥ लुत्फ़ आता था उन्हे पाने तैर चलने में, जब तक उम्मीद थी लगता था ज़िंदगी में दिल ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more