■ मुक्तक : 648 – लुत्फ़ को अपने ही

लुत्फ़ को अपने ही हाथों से शूल करता हूँ ।। जानते-बूझते ये कैसी भूल करता हूँ ? जिसका हक़दार , न हूँ क़ायदे से मैं क़ाबिल , उसकी दिन-रात तमन्ना फिज़ूल करता हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 647 – कितनी मुद्दतों से

कि कितनी मुद्दतों से अब तलक भी दम बदम अटका ॥ बढ़ा मुझ तक कहाँ जाकर तेरा पहला क़दम अटका ? तू जैसे भी हो आ जा देखने दिल से निकल अपलक , तेरे दीदार को मेरी खुली आँखों में दम अटका...Read more

मुक्तक : 646 – अपना दूध–दही

अपना दूध – दही गाढ़ा औरों का पनीला बोलेगा ॥ अपनी सब्ज़ी का रंग हरा औ’ शेष का पीला बोलेगा ॥ अपने कंठ को बेचने की दूकान लगाए तो निस्संशय , अपना स्वर प्रत्येक गधा कोयल से सुरीला बोलेगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 645 – सब्ज़ कब सुर्ख़

सब्ज़ कब सुर्ख़ कब ? ये ज़र्द-ज़र्द लिखती है ॥ औरत-औरत ही लेखती न मर्द लिखती है ॥ चाहता हूँ मैं लफ़्ज़-लफ़्ज़ में ख़ुशी लिक्खूँ , पर क़लम मेरी सिर्फ़ दर्द-दर्द लिखती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 644 – सीने में दिल

सीने में दिल सवाल उठाता है !! मग्ज़े सर भी ख़याल उठाता है !! सबके गुल पे ज़माना चुप मेरी , सर्द चुप पे बवाल उठाता है !! (मग्ज़े सर = मस्तिष्क , गुल=हल्ला-गुल्ला ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 643 – सिर्फ़ होती है ख़ता

सिर्फ़ होती है ख़ता या कि भूल होती है ॥ ये नगीना नहीं ये ख़ाक-धूल होती है ॥ मैंने माना कि मोहब्बत में तू हुआ है फ़ना , फिर भी मत कह कि मोहब्बत फ़िजूल होती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more