उनके कहे से ,

हमारी काक ध्वनि कोयल कुहुक हो जाएगी क्या ?

हमारी पिचकी-चपटी नाक नुकीली हो जाएगी क्या ?

उनके बारंबार कहते रहने से हमारा पजामा जींस नहीं हो जाएगा ।

कोई भूलकर भी

जब वह नहीं कहता

जो-जो हम सुनना चाहते हो ;

और तब हमारे पूछने से पहले ही

हमारे मन के अनुसार वे हमारे बौने क़द को हिमालय

हमारी कच्छप-चाल को चीता-गति कहते चले जाते हैं

जो

हम भली-भाँति जानते हैं कि यदि वे हमारे मातहत नहीं होते तो

हमारे खुरदुरेपन को कभी चिकनाई नहीं कह सकते थे ;

यदि हमसे भयग्रस्त नहीं होते तो

हमारी जली-भुनी रोटी को कभी भी मालपुआ नहीं कहते ।

अपनी बंदरिया को ऐसों के द्वारा सुंदरी , सुंदरी  पुकारे जाने पर

हमारा प्रसन्न होना आत्मवंचना  के सिवाय क्या है ?

ऐसे चापलूसों के बजाय

यदि हम सचमुच ही जानना चाहते हैं कि हम क्या हैं

तो

जो टुकड़े-टुकड़े होकर भी

सबकी असली सूरत का सच्चा बखान करते हैं

हमें सदैव

डटकर सामना करने की हिम्मत रखनी पड़ेगी

उन आईनों से ।  

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *