तेरी इच्छा तू उज्ज्वल या काला दे ।।

रँग कैसा भी रूप लुभाने वाला दे ।।1।।

निःसन्देह सकल उपवन की चाह नहीं ,

किन्तु मुझे प्रत्येक पुहुप की माला दे ।।2।।

मृदु वचनों को दे स्वातंत्र्य तू तितली सा ,

कटु-कर्कश वाणी को मोटा ताला दे ।।3।।

रक्त-स्वेद से सींचींं फसलों को कृपया ,

वर शीतलता मत बर्फीला पाला दे ।।4।।

वस्त्रविहीनों को दे सूती पोशाकें ,

मत चीवर , बाघंबर या मृगछाला दे ।।5।।

बेघर को इक पर्णकुटी , मछली को कुआँ ,

खग को रहने नीड़ , मकड़ को जाला दे ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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