शायद मुझको कम दिखता है ॥

ज़िंदा भी बेदम दिखता है ॥

वो मस्ती में गोते खाता ,

दीदा-ए-पुरनम दिखता है ?

छेड़ो मत उस चुप-चुप से को ,

पूरा ज़िंदा बम दिखता है ॥

जाने क्यों मुझको वो फक्कड़,

इक शाहे-आलम दिखता है ?

वैसे वो दारू है ख़ालिस ,

यों आबे-ज़मज़म दिखता है ॥

तुमको ही बस ब्रह्मा-हरि वो ,

मुझको किंकर-यम दिखता है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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