यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ ॥

वो समझें मैं वज्र मूर्ख हूँ ॥

मेरा बगुला-भगत से नाता ,

हर सियार मेरा लघु भ्राता ,

कथरी ओढ़ के पीता हूँ घी ,

एड़ा बनकर पेड़ा खाता ,

मैं जानूँ कितना मैं धूर्त हूँ  ?

चक्षु खुले हैं किन्तु सुप्त मैं ,

वो ये सोचें स्वप्नलुप्त मैं ,

मैं ही जानूँ कहाँ प्रकट हूँ ?

मैं ही जानूँ कहाँ गुप्त हूँ ?

मैं विचित्र अदृष्ट मूर्त हूँ ॥

लकवा पीड़ित वाम हस्त है ,

पग दायाँ पोलियो ग्रस्त है ,

आँख मोतियाबिंद समर्पित ,

बहरेपन से कर्ण त्रस्त है ,

अर्ध काय पर हृदय पूर्ण हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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