सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?

सन्नाटे में बम फट जाये ।

गज़ भर की ज़बान कट जाये ।

कोई नहीं जब कुछ कहता है तो ,

मैं ही क्यों अपना मुँह खोलूँ ?

क्यों ऐसा चाहे जब घटता है ?

सोच रहे सभी ये सब क्या है ?

टहलते हुए सब खा पीकर ,

इक मैं ही भूखा इत-उत डोलूँ !

क्वाँरे क्यों बंजर जोत रहे ?

मुखड़ों पे डामल पोत रहे ?

पूछ रहा है पति पत्नी से ,

क्या मैं तेरी सखि के सँग सोलूँ ?

साथ समय के ये भागे है रे ।

बल्कि कहीं तो उससे आगे है रे ।

जैसा हुआ ये जग धावक है ,

मैं भी कहीं न वैसा हो लूँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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