फिर गये जब घूर के दिन ॥

चापने उसको लगे सब ।

चाटने उसको लगे सब ।

पास में आने से जिसके –

कल तक आती थी जिन्हें घिन ॥

आँख का तारा हुआ है ।

सब का ही प्यारा हुआ है ।

जो न फूटी आँख भाया –

था किसी को एक भी छिन ॥

भाग्य फूटा जग गया है ।

जैकपॉट इक लग गया है ।

भीख न मिलती थी जिसको –

दान दे अब नोट गिन-गिन ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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