एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥

खुरदुरेपन में भी सच नवनीत थी ।

चीख में भी पहले मृदु संगीत थी ।

एक पाटल पुष्प की वह पंखुड़ी –

दूब कोमल अब कंटीला पेड़ थी ॥

तमतमा बैठी अचानक क्या हुआ ?

मैंने उसको बस लड़कपन सा छुआ !

कह गई अक्षम्य वह अपराध था –

जो ठिठोली, इक हँसी, टुक छेड़ थी ॥

मात्र जन थी अब नगर अध्यक्ष वो ।

वर्षों के उपरांत हुई प्रत्यक्ष वो ।

जब वो मिलकर चल पड़ी तो ये लगा –

भेंट थी वो या कोई मुटभेड़ थी ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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