मुक्तक : 666 – हो गया इक दिन नशा

खुल के या छुप के जनाब अच्छा नहीं ॥ ताकना उनका शबाब अच्छा नहीं ॥ हो गया इक दिन नशा भूले मगर , रोज़ ही पीना शराब अच्छा नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत (19) – सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे

हाँ अपने अपराध मुझे स्वीकार्य सभी , ऐसा दण्ड दो हो पापों का क्षय जिससे ॥ सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे । लौह-श्रंखला भार से कर दो युक्त मुझे । नख उखाड़ो, कीलें ठोंको, दागो, पीटो और हँसो भीषण पीड़ा दे...Read more

गीत (18) – तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे

क्यों तेरी अनुपम छटा का आर्य , चित्र आँखों में मढ़ा है रे ? जैसे कोई भक्त रामायण । सह-हृदय करता है पारायण । पाठ्यक्रम की मैंने इक अनिवार्य – तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे ॥ कोसता हूँ क्यों सतत वह क्षण ?...Read more

अकविता (14) – सतत अनुसंधान ,शोध ,खोज ,तलाश

अभी तो हम चेतन हैं । यदि पहले से ही हमें पता हो हमारी मौत का दिन । हमें पता हो कब होने वाला है हमारा अपमान ? हम जिस परीक्षा में बैठने वाले हैं उसमें क्या पूछा जाने वाला है ?...Read more

गीत (17) : बोलो अब तक किसने देखे ?

बोलो अब तक किसने देखे ? जितने सर पर केश तुम्हारे । नीलगगन में जितने तारे । स्वप्न सुनहरे लेकर तुमको – मैंने गिनकर इतने देखे ॥ गहन उदधि कभी तुंग हिमाचल । कभी अगन तुम कभी बरफ-जल । समय-समय पर...Read more