प्रेम से यूँ मत तको ना ॥

सज-सँवर कर खण्डहर के –

फिर अकेले में चलो ना ॥

युक्ति कोई आज़माकर ।

फिर दुपट्टे को गिराकर ।

उसको शरमाकर उठाने –

सामने मेरे झुको ना ॥

बिन किये श्रंगार , बेढब ।

मुझसे टकराईं थीं तुम जब –

हड़बड़ी में जाने किसकी ?

ठीक फिर वैसी भिड़ो ना ॥

यदि न कह पाओ तो क्या डर ?

पेन-कागज़ फिर उठाकर ।

अपने मन का हाल सारा –

मुझको चिट्ठी में लिखो ना ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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