इसलिए वह दिल में रहते ॥

रात-दिन याद उनकी आती ,

नद सरीखे अश्रु बहते ॥

सब बुरा ही कहते मुझको ।

गालियाँ ही बकते मुझको ।

इक वही दुनिया में हैं जो –

मुझको बस अच्छा ही कहते ॥

हर तरफ से कोंचती जब ।

मुझको दुनिया टोंचती जब ।

वो कवच और ढाल बनकर –

ख़ुद पे भाले-तीर सहते ॥

भीड़ मुझ पर से सम्हलती ।

रौंदती चलती कुचलती ।

वो फ़रिश्ता से उठाने –

आके मेरा हाथ गहते ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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