व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥

जिसको पाना सूर्य पे जाना ।

भर बारिश में पतंग उड़ाना ।

जिसने मुझको स्वयं रखा है –

पाने से पहले आवर्जित ॥

क्यों सुंदर वह वज्र हृदय की ?

देखो लीला भाग्य समय की ।

जो मुझसे निर्लिप्त पूर्णतः –

मैं उसपे मन प्राण से अर्पित ॥

धन कुबेर वो रंक बड़ा मैं ।

मृदु उबटन वो पंक कड़ा मैं ।

मेल न मेरा उसका फिर भी –

मैं उससे मिलने उत्कंठित ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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