उसे कितना ख़्याल है

हमारी आँखों के स्वाद का ।

आज मैंने जाना ।

जबकि उसे देखा

उजाले में ,

दरारों से छिपकर ।

वह सब जो वह लादे रहती थी

निर्धन होकर भी

सर्वथा नकली , सस्ते ढेरों अलंकार –

जो उसके चेहरे को प्रकट करने के बजाय

विलुप्तप्राय करते रहते थे

छटपटाकर

सिर के पहाड़ की तरह पटकते हुए ,

फोड़े के मवाद की तरह मसकते हुए ।

मैंने पाया

यदि वह

बिना आभूषणों के हमारे सामने पड़ जाए

तो उबकाई रोके न रुके

यह जानकर

मुझे उसकी आभूषण लादे रहने की विवशता पर

जिसे मैं अब तक उसका शौक समझकर  

उसका तिरस्कार करता रहा था

घृणा उगलता रहा था

आज असीम श्रद्धा उमड़ आई ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *