मैं

वहाँ भी

अरे जिसका नाम तक लेने से

लोग डरते हैं

हर्ष पूर्वक

सदा सदा के लिए

चलने को ,

बसने को तैयार हूँ

क्या तो कहते हैं उसे ?

हाँ ! नर्क ।

क्योंकि मैं जानता हूँ

मेरा अनुभव है

सम्पूर्ण विश्वास है

मुझे सब उल्टा लगता है

जैसे –

तपन ठंडी ,

काँटे फूल ,

पीड़ा आनंद ,

जब तुम साथ होती हो ।

तो फिर निश्चय ही

क्यों न

नर्क भी स्वर्ग लगेगा ?

बोलो-बोलो !

अकेले नहीं ।

तुम्हारे बिन भी तो सब उल्टा लगता है

जैसे

ठंडी तपन ,

फूल काँटे ,

आनंद पीड़ा ।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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