क्यों तेरी अनुपम छटा का आर्य ,

चित्र आँखों में मढ़ा है रे ?

जैसे कोई भक्त रामायण ।

सह-हृदय करता है पारायण ।

पाठ्यक्रम की मैंने इक अनिवार्य –

तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे ॥

कोसता हूँ क्यों सतत वह क्षण ?

जब हुआ तुझ पर हृदय अर्पण ।

प्रेम मेरा तुझको अस्वीकार्य –

पर तेरा मुझ सिर चढ़ा है रे ॥

ढाल का सुंदर मेरी कण-कण ।

तू ही करता था मेरा यों पण ।

क्यों हुआ अब मैं तुझे परिहार्य ?

तूने ख़ुद मुझको गढ़ा है रे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *